पूज्या साध्वी वर्या चारु दर्शा श्रीजी की स्मृति में गुणानुवाद सभा संपन्न, समाजजानो ने दी भावभीनी भावांजलि

रतलाम जिले के सैलाना में श्री जैन श्वेताम्बर मूर्ति पूजक के तत्वावधान में चातुर्मासार्थ विराजित साध्वीवर्या श्री चारु दर्शा श्रीजी के देवलोकगम पर् जैन मंदिर स्थित उपाश्रय में गुणानुवाद सभा का आयोजन किया गया।
गुणानुवाद सभा का प्रारंभ जैन श्रीसंघ के पदाधिकारियों ने साध्वीजी के चित्र पर दीप प्रज्वलित कर नवकार महामंत्र के जाप के साथ किया। उपस्थित वक्ताओं ने पूज्य साध्वी श्री के संयमी जीवन, उनकी कठोर साधना और समाज को दिए गए मंगल उपदेशों को याद किया।
इस अवसर पर श्री संघ अध्यक्ष सुरेंद्र मेहता ने कहा कि साध्वीश्री का जीवन त्याग और तपस्या की प्रतिमूर्ति था। उनका देवलोकगमन संपूर्ण जैन समाज के लिए एक अपूरणीय क्षति है।
प्रियंक चंडालिया ने कहा साध्वीश्री ने हमेशा जीव दया, करुणा और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। उनके दिखाए मार्ग पर चलना ही सच्ची भावांजलि होगी।इस अवसर पर स्मिता राजेश चंडालिया ,पूर्वा शुभम मेहता,प्रमोद भंडारी,राजेश कोठारी,अपूर्व नाहटा,एवं नन्हे बालक पूर्वम् मेहता द्वारा भी अपनि भावांजलि शब्दों के माध्यम से व्यक्त की एवं साध्वीश्री के जीवन प्रसंगों पर प्रकाश डाला। सभा के अंत में समस्त श्रीसंघ द्वारा दो मिनट का मौन रखकर चरण वंदन के साथ उनके उत्तम स्वरूप (मोक्ष) की कामना की गई।
सभा का संचालन वैभव सियार ने किया तथा अंत में शुभम मेहता ने उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं का आभार व्यक्त किया।

स्मृति शेष मेरी कलम से,,,,,,,,
15 मई 1956 को धर्म नगरी उज्जैन में श्रेष्ठीवर्य उच्छबलाल शांतीबाई दलाल तरसींग परिवार में जन्म हुआ था तब परिजनों ने आपका नाम चंदा रखा।
छः बहन भाई मे चन्दा दूसरे नम्बर की सन्तान थी। आपके सांसारिक पिता स्व० उच्छबलाल तरसींग धार्मिक विचारो के साथ साथ जिनशासन को समर्पित सागरजी महाराज के शिष्य आचार्य देव
श्री चन्दसागर सुरिश्वर के सच्चे भक्त व ऋषभ देव छगनीरामजी के आजीवन ट्रस्टी व प्रवक्ता रहे।
इस परिवार में उस वक्त चन्दाबेन के जीवन में प्रारम्भ से धार्मिक संस्कार व त्याग तपस्या की भावना थी। आपने हायर सेकेन्डरी तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद 1974-75 के मालव ज्योती इन्दु श्रीजी के चातुर्मास के दौरान साध्वीजी हेमेन्द्र श्रीजी महाराज के सानिध्य मे रहने के दौरान वैराग्य भावना उत्पन्न हुई और 2 वर्षों तक विभिन्न धार्मिक क्रिया,तप आराधना में साथ रहने के बाद
महा सुदी तेरस 20 फरवरी 1978 को मुनिराज अभ्युदय सागर जी जो बाद में ‘पंन्यास प्रवर’ तथा मुनिराज नवरत्न सागरजी महाराज जो बाद में ‘आचार्य प्रवर’ बने की निश्रा में दीक्षा अंगीकार करने के बाद आपका नाम श्री चारु दर्शाश्रीजी महाराज घोषित किया गया था।
आपने राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, चेन्नई, बैंगलोर, आन्ध्र प्रदेश सहित अनेक स्थानों पर चातुर्मास करते हुए जिनशासन की अलख जगाते हुए धर्म प्रभावना की। वर्तमान मे आपकी 9 शिष्याए व प्रशिष्याए है। जिसमे 7 का चातुर्मास ठाणे (मुम्बई मे है) तथा अभी 2 साध्वीजी सैलाना में विराजित है।
70 वर्षीय पूज्या साध्वी चारु दर्शा श्रीजी करीब 22 वर्ष से संयम मार्ग पर चलने के बाद करीब 48 वर्षों तक जिन शासन की अलख जगाते रहे।
सरल स्वभावी जिन शासन गुरु को समर्पित पूज्य चारु दर्शा श्रीजी का देवलोक गमन सकल जैन समाज ही नहीं अपितु संपूर्ण जिनशासन के लिए भारी क्षति है।
VIMAL KATARIYA
NEWSMP 24.com
EDITOR- IN – CHIEF







