ग्वाला समाज में लोक परंपरा का अनूठा पर्व भुजरिया भेंट कर क्षमा याचना के साथ भाईचारे का संदेश दिया

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ग्वाला समाज सैलाना द्वारा पारंपरिक एवं धार्मिक आस्था का प्रतीक भुजरिया पर्व बड़े धूमधाम, उत्साह और आपसी भाईचारे के साथ मनाया गया। पर्व के अवसर पर समाज की महिलाओं, बालिकाओं एवं पुरुषों ने सामूहिक रूप से भाग लेकर अपनी प्राचीन लोकपरंपरा को जीवंत रखा।

रतलाम जिले के सैलाना में  ग्वाला/यादव समाज का पारंपरिक जीवन पशुपालन एवं कृषि से जुड़ा रहा है। इसी कारण अच्छी वर्षा, अच्छी फसल, धन-धान्य, सुख-समृद्धि तथा समाज में आपसी प्रेम एवं सौहार्द की कामना के साथ भुजरिया पर्व मनाने की परंपरा बरसों से चली आ रही है।

  पारंपरिक एवं धार्मिक आस्था का प्रतीक भुजरिया पर्व बड़े धूमधाम, उत्साह और आपसी भाईचारे के साथ मनाया गया। पर्व के अवसर पर समाज की महिलाओं, बालिकाओं एवं पुरुषों ने सामूहिक रूप से भाग लेकर अपनी प्राचीन लोकपरंपरा को जीवंत रखा।

मान्यता है कि ग्वाला/यादव समाज का पारंपरिक जीवन पशुपालन एवं कृषि से जुड़ा रहा है। इसी कारण अच्छी वर्षा, अच्छी फसल, धन-धान्य, सुख-समृद्धि तथा समाज में आपसी प्रेम एवं सौहार्द की कामना के साथ भुजरिया पर्व मनाया गया।

भुजरिया पर्व की शुरुआत नागपंचमी के दिन  समाज की महिलाएं एवं बालिकाएं समूह के रूप में खेत अथवा पवित्र स्थान से मिट्टी लाकर पारंपरिक पात्र, टोकरी या कुंडे में मिट्टी भरकर उसमें गेहूं अथवा जौ के बीज बोती हैं। इसके बाद भुजरिया को घर के पवित्र स्थान पर रखकर प्रतिदिन पानी दिया जाता है तथा पूजा-अर्चना की जाती है। सावन के दौरान भुजरिया को झूला भी झुलाया जाता है।

रक्षाबंधन तक भुजरिया की पूजा-अर्चना करने के पश्चात समाज द्वारा सामूहिक भुजरिया यात्रा निकाली गई। यात्रा में बड़ी संख्या में समाज की महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुईं। बालिकाओं एवं बच्चों ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया। ढोल-ढमाकों एवं पारंपरिक गीतों के साथ निकली यात्रा ने पूरे वातावरण को उत्सवमय बना दिया।

विसर्जन से पूर्व कालिका माता मंदिर में दर्शन एवं सामूहिक आरती की गई। इसके पश्चात भुजरिया को श्रद्धापूर्वक जलस्रोत तक ले जाकर विधि-विधान एवं धार्मिक आस्था के साथ भुजरिया विसर्जन किया गया।

भुजरिया मिलाने की परंपरा इस पर्व का विशेष सामाजिक पक्ष है। इस दौरान समाज के लोग एक-दूसरे को भुजरिया भेंट कर वर्षभर में हुई भूल-चूक के लिए क्षमा मांगते हैं तथा बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इससे समाज में आपसी प्रेम, सद्भाव, एकता और भाईचारे की भावना मजबूत होती है।

ग्वाला समाज सैलाना के इस आयोजन में महिलाओं, युवाओं, बच्चों एवं समाज के वरिष्ठजनों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की तथा अपनी सांस्कृतिक एवं पारंपरिक विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।

भुजरिया पर्व की शुरुआत नागपंचमी के दिन से होती है। इस अवसर पर समाज की महिलाएं एवं बालिकाएं समूह में खेत अथवा पवित्र स्थान से मिट्टी लाकर पारंपरिक पात्र, टोकरी या कुंडे में मिट्टी भरकर उसमें गेहूं अथवा जौ के बीज बोती हैं। इसके बाद भुजरिया को घर के पवित्र स्थान पर रखकर प्रतिदिन पानी दिया जाता है तथा पूजा-अर्चना की जाती है। सावन के दौरान भुजरिया को झूला भी झुलाया जाता है।

रक्षाबंधन तक भुजरिया की पूजा-अर्चना करने के पश्चात समाज द्वारा सामूहिक भुजरिया यात्रा निकाली गई। यात्रा में बड़ी संख्या में समाज की महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुईं। बालिकाओं एवं बच्चों ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया। ढोल-ढमाकों एवं पारंपरिक गीतों के साथ निकली यात्रा ने पूरे वातावरण को उत्सवमय बना दिया।

विसर्जन से पूर्व कालिका माता मंदिर में दर्शन एवं सामूहिक आरती की गई। इसके पश्चात भुजरिया को श्रद्धापूर्वक जलस्रोत तक ले जाकर विधि-विधान एवं धार्मिक आस्था के साथ भुजरिया विसर्जन किया गया।

भुजरिया मिलाने की परंपरा इस पर्व का विशेष सामाजिक पक्ष है। इस दौरान समाज के लोग एक-दूसरे को भुजरिया भेंट कर वर्षभर में हुई भूल-चूक के लिए क्षमा मांगते हैं तथा बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इससे समाज में आपसी प्रेम, सद्भाव, एकता और भाईचारे की भावना मजबूत होती है।

ग्वाला समाज सैलाना के इस आयोजन में महिलाओं, युवाओं, बच्चों एवं समाज के वरिष्ठजनों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की तथा अपनी सांस्कृतिक एवं पारंपरिक विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।

News Mp 24
Author: News Mp 24

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